15 वीं शताब्दी में कुल्लू जिला का मध्यकालीन इतिहास व देव संस्कृति,मंदिरों का इतिहास टांकरी लिपि में अंकित-यतिन शर्मा
कहा-हिमाचल प्रदेश में13 वी शताब्दी में टांकरी लिपि की शुरुआत हुई राजाओं की आपसी संधियों से टांकरी लिपि प्रचलन अधिक था

अटल सदन के सभागार में भाषा एवं संस्कृति विभाग कुल्लू और आशियां कला मंडल के संयुक्त तत्वाधान में 5 दिवसीय टांकरी लिपि कार्यशाला हुई शुरू
न्यूज मिशन
कुल्लू
कुल्लू जिला मुख्यालय अटल सदन के सभागार में भाषा एवं संस्कृति विभाग जिला कुल्लू और आशियां कलामंडल कल्लू के संयुक्त तत्वाधान में 5 दिवसीय टांकरी लिपि के कार्यशाला शुरुआत हुई जिसमें विद्वान विशेषज्ञ लेखक यतिन शर्मा के द्वारा टांकरी लिपि के बारे में प्रतिभागियों को विस्तृत जानकारी उपलब्ध करवाई जा रही है जिसमें करीब 3 दर्जन प्रतिभागी भाग ले रहे हैं और 5 दिनों तक टांकरी लिपि से संबंधित बर्णमाला,शब्द ज्ञान के बारे में संपूर्ण ज्ञान के बारे में पढ़ाया जा रहा है। जिससे टांकरी लिपि के संरक्षण संवर्धन के लिए युवा पीढ़ी को कार्यशाला में संपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवाई जा रही है
-टांकरी लिपि के विद्वान यतिन पंडित ने कहा कि कुल्लू जिला मैं भाषा एवं संस्कृति विभाग कुल्लू जिला और आशियां कला मंडल कल्लू के संयुक्त तत्वाधान में पांच दिवसीय तंकारी लिपि की कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है उन्होंने कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य टांकरी लिपि के संरक्षण संवर्धन के लिए और युवाओं में टांकरी लिपि के प्रति युवाओं में रुचि पैदा हो और टंकी लिपि का संरक्षण हो इसके लिए पांच दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है उन्होंने कहा कि टांकरी लिपि की उत्पत्ति 13वीं शताब्दी में हुई जिसमें यह माना जाता है पाकिस्तान के टंका प्रांत से जनजाति के द्वारा उत्पत्ति की गई है उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश में टांकरी लिपि 13वीं शताब्दी में आई और यहां के देवताओं का इतिहास मंदिरों का इतिहास टांकरी लिपि में अंकित किया गया है उन्होंने कहा कि देवताओं के मोहरो और भंडारों में टांकरी लिपि का अखिलेख अंकित है। सोनालिका किसके अलावा महत्वपूर्ण चीज यह भी है कि टंकी में यहां के तंत्र का हिस्सा भी लिखा गया है उन्होंने कहा कि उन्होंने कहा कि पुरातन समय में टांगरी लिपि के साथ-साथ शारदा लिपि प्रचलन रहा है शारदा लिपि से ही टांकरी लिपि की उत्पन्न हुई है उन्होंने कहा कि मंडी,चंबा,सहित अन्य जिलों में टांकरी लिपि का प्रचलन था उन्होंने कहा कि कुल्लू जिला 15 वीं शताब्दी में राजाओं की संधियों और देवी देवताओं मंदिरों में जुड़ने के साथ अधिक प्रचलन था कुल्लू जिला मध्यकालीन इतिहास और देवी देवताओं और मंदिरों का इतिहास टांकरी लिपि में अंकित है। इसका अनुवाद अभी तक पूरी तरह से नहीं हुआ है उन्होंने कहा कि उसके अनुवाद करने की जरूरत है उसको पढ़ने के लिए टांकरी लिपि का ज्ञान होना अति आवश्यक है ताकि आने वाली पीढ़ी को भी इसका ज्ञान हो और वह भी अपना कल्लू का इतिहास पढ़ सके इसके लिए टांकरी लिपि को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है उन्होंने कहा कि इसके लिए सरकार की तरफ से भाषा एवं संस्कृति विभाग का सहयोग मिल रहा है जिससे टांकरी लिपि को संरक्षण करने के लिए प्रयास किया जा रहे हैं।



