लगघाटी की महिलाएं परंपरागत फँसलें मोटे अनाज को संरक्षण करने के लिए लोगों कर रहे जागरूक
मोटे अनाज के सेवन से मधुमेह,डायबिटीज ,शुगर सहित अन्य कई गंभीर बीमारियों को करता है कंट्रोल

सरस मेले में महिलाएं परंपरागत फँसलें कोदरा, रागी, घांघडी,सलियारा लाल चाबल के व्यंजनों को परोस कर रहे पौष्टिकता का दे रही संदेश
महावीर स्वयं सहायता समूह बुआई और झांसी स्वयं सहायता समूह की महिलाएं को मोटे अनाजों के संरक्षण के प्रति कर रही जागरूक
लगघाटी की महिलाएं प्रदेश के मेले में स्टॉल लगाकर लोगों को कर रहे जागरूक
न्यूज मिशन
कुल्लू
कुल्लू जिला के लगघाटी की ग्राम पंचायत बुआई और चौपड़सा की महिलाएं परंपरागत फसलों के संरक्षण और पौष्टिकता को लेकर लोगों को जागरुक कर रही है कुल्लू जिला के सरस मेले में महावीर स्वयं सहायता समूह बुआई और झांसी स्वयं सहायता समूह चौपड़सा की।महिलाएं स्टॉल लगाकर मोटे अनाज कोदरा, रागी, घांघडी,सलियारा लाल चाबल के व्यंजनों को परोस कर पौष्टिकता का संदेश दे रही है। परंपरागत अनाज कोदरा, रागी, घांघडी,सलियारा लाल चाबल में कई पोषक तत्वों से डायबिटीजए, शुगर,कोलेस्ट्रॉल और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों को कंट्रोल करता है मोटे अनाज कोदो मिलेट में औषधीय गुणों से भरपूर है। कोदो एक ऐसा अनाज है जो लंबे समय तक रखने के बाद भी खराब नहीं होता है। वहीं,अब कोदो अनाज से चाय बननी भी तैयार हुई है। जहां वर्तमान में चाय शुगर को बढ़ावा दे रही है। वहीं, कोदो चाय का नया अविष्कार लोगों के रोगों का ईलाज करेगी। हिमाचल प्रदेश कृषि विभाग कुल्लू के सौजन्य से पुराने अनाजों से बनने वाले व्यंजनों को स्टॉल लगाया है। यह स्वयं सहायता समूह लोगों को पै्रक्टिकल में पुराने अनाजों से बनने वाले व्यंजनों को परोस रही है। वहीं, इससे शरीर क्या फायदे होंगे, इसके बारे में भी जानकारी दे रहे हैं। जानकारी के अनुसार यह अनाज मधुमेह से पीडि़त लोगों के लिए फायदेमंद है। फाइबर भी पाचन और अवशोषण को धीमा कर देता है। जिससे खाना-खाने के बाद रक्त शर्करा में तेजी से वृद्धि होती को रोका जा सकता है। साथ ही फाइबर रिच फूड भूख को नियंत्रित कर वजन को बढऩे से रोकने में भी मदद करते हैं, जो की मधुमेह रोगियों के लिए जरूरी है। कोदो अनाज में भरपूर मात्रा में फाइबर के साथ प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन पाया जाता है। इसके सेवन से शरीर को अनेक लाभ मिलते हैं।
बन रहे हैं कोदरे की चाय-कोदरे के सिड्डू
बता दें कि महावीर स्वयं सहायता समूह बुआई के स्टॉल में कोदरे की चाय, कोदरे के सिड्डू और नागा जौ के सिडडू के सलियारा की खीर मिल रही है। यह व्यंजन शरीर के लिए ताकतवर होते हैं। खासकर बुजुर्ग लोग कोदरे की चाय और सिड्डू की पसंद कर रहे हैं।बुआई पंचायत के प्रधान मोहर सिंह ने कहा कि पौष्टिक अनाजों का सेवन बढ़ाएं तन मन को स्वस्थ बनाएं उन्होंने कहा कि इसी स्लोगन के साथ हम लोगों को मोटे अनाज के संरक्षण को लेकर जागरूक कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश में मोटे अनाज में कोदरा, रागी, सलियारा नंगे जौ कि फैसले होती है उन्होंने कहा कि मोटे अनाज में पौष्टिकता भरपूर होती है जिसमे फाइबर की प्रचुर मात्रा होती है। जिससे पाचन तंत्र मजबूत रहता है उन्होंने कहा कि मधुमेह और शुगर डायबिटीज के रोगों को कंट्रोल करता है। उन्होंने कहा कि खासकर कोरोना कल में इम्यूनिटी को बढ़ाने के लिए मोटे अनाज के सेवन से फायदा मिला है कोदो(कोदरा) मिलेट में फेनोलिक एसिड नामक योगिक मौजूद होता है, जो पेंक्रियाज में एमाइलेज को बढ़ाकर इंसलिन के प्रोडक्शन को प्रोत्साहित करता है। वहीं, शरीर में इंसुलिन की सही मात्रा शुगर लेवल को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। जिससे डायबिटीज की स्थिति में राहत मिलती है। उन्होंने कहा कि उनकी पंचायत में पुराने अनाजों को लगभग सभी बीज रहे हैं। नई पीढ़ी को भी इन पुराने अनाजों की बिजाई के लिए प्रेरित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बुवाई पंचायत की महिलाओं के द्वारा पिछले 3 बर्षो प्रदेश के कई जिलों में शिमला धर्मशाला कुल्लू मंडी में कोदरे क़ी चाय, सिड्डू और मोमो सलियारा की खीर व्यंजन बनाकर लोगों को प्रक्रिया आ रहे हैं ताकि लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहे और फास्ट फूड से बच्चों को दूर रखें जिससे बहुत सारी बीमारियों का शिकार बच्चे हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि पंचायत में मोटे अनाज के संरक्षण के लिए 2 अक्टूबर की ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित कर मनरेगा के कार्य उन्हीं लोगों को दिए जाएंगे जो जिन्होंने अपने खेत में काम से कम एक परंपरागत फसलों की विजई की हो उन्होंने कहा कि मोटे अनाज की डिमांड लगातार बढ़ रही है और इससे यह जो पोशाक आना जो का संरक्षण करने के लिए पंचायत की महिलाओं और घाटी की महिलाओं द्वारा लोगों को जागरूक किया जा रहा है उन्होंने कहा कि परंपरागत फसलों की आयु भी बहुत लंबी होती है और ऐसे में 55,60 साल पुराना कोदरा,काठु, घांघडी का बीज किसानों के पास उपलब्ध और इन अनाजों को अकाल का अनाज भी कहा जाता है।
लगघाटी की झांसी स्वयं सहायता समूह की प्रधान विमल ठाकुर ने कहा कि परंपरागत फासले हमारे मोटे अनाज के संरक्षण के लिए महिलाएं लोगों को जागरुक कर रही है उन्होंने कहा कि कोदरे,घांघडी, के व्यंजन बनाकर लोगों को परोस रहे हैं और लोगों को मोटे अनाज से पौष्टिकता को लेकर भी जानकारी दे रहे हैं उन्होंने कहा कि मोटे अनाज के सेवन से कई तरह की बीमारियों समाप्त होती है उन्होंने कहा कि लोगों को चार्ट लगाकर मोटे अनाज के सेवन से क्या फायदे हैं उसको लेकर भी जागरुक कर रहे हैं उन्होंने कहा कि पुराने परंपरागत अनाज के व्यंजन लोगों को पसंद आ रहे हैं और लोगों को भी जानकारी मिल रही है उन्होंने कहा कि परंपरागत फैसले के सेवन से पुराने लोगों की आयु सैकड़ो वर्ष होती थी उन्होंने कहा कि आज भी गांव में जो पुराने अनाज का सेवन लोग करते हैं उनकी आयु 90 साल से लेकर 105 साल तक के लोग अभी भी जीवित है। उन्होंने कहा कि सरकार भी मोटे अनाज के संरक्षण के लिए किसने बागवानों को जागरुक कर रही है ताकि यह जो परंपरागत फैसले है इनका उपयोग लोग करें और जिस परंपरागत फसलों का संरक्षण भी हो और लोगों को उपयोग से बीमारियां भी ना हो उन्होंने कहा कि आज लोग छोटे बच्चे फास्ट फूड पिज़्ज़ा बर्गर का उपयोग कर कई बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं उन्होंने कहा कि ऐसे में परंपरागत फसलों का उपयोग लोगों की सेहत के लिए भी अच्छे हैं और ऐसे में पुरानी फैसले के उपयोग से लोगों को शुगर डायबिटीज सहित अन्य कई बीमारियों से दूर रहती है उन्होंने कहा कि आज बच्चों में जहां खून की कमियां है आयरन की कमियां है इसलिए लोगों को पुरानी फैसले का उपयोग करना चाहिए ताकि स्वस्थ रह सके। उन्होंने कहा कि हमारा स्वयं सहायता समूह लोगों को जागरूक करने के लिए स्टॉल लगाकर परंपरागत फसलों के व्यंजन पुरुष रहे हैं ताकि लोग इन परंपरागत फसलों को संरक्षण करने के लिए प्रयास करें।
जिला कृषि अधिकारी कुल्लू डॉक्टर अंकिता शर्मा ने कहाकि मोटे अनाज का इतिहास 5 हजार साल पूराना है और पूराने समय में पूर्वजों पूराने अनाज को खाकर जीवन यापन करते थे और स्वस्थ रहते थे।उन्होंने कहाकि देश में ग्रीन रेवोलेशन के बाद गेंहू और चावल के उत्पाद से किसानों को फायदा हुआ और उसके बाद अधिक उत्पादन के बाद गेंहू और चावल खाने से लोगों धीरे धीरे मोटे अनाज लुप्त हो गए। उन्होंने कहाकि देश में लोग गेंहू और चावल खाने का प्रचलन बढ़ गया और उससे लोगों के पाचनतंत्र बदल गया जिससे मोटे अनाज के पोष्ट्रिक तत्वों में बीमारियों से लड़ने की क्षमता थी लेकिन अब गेंहू और चावल के उपयोग से कई बीमारियों का शिकार हो रहे है।उन्होंने कहाकि देश में गेंहू और चावल की किस्में बाहर से लाई है जिससे इन अनाज के खाने से लोगों की पाचनतंत्र कमजाेर हो गई और उससे लोगों में वीपह शुगर और थाईराइयड़ की बीमारियों के कारण ग्रसित हो रहे है और छोटे बच्चों में भी खून की कमी हो रहे है और छोटे छोटे बच्चों को भी गंभीर बीमारियां हो रह है।उन्हांने कहाकि कुल्लू में कोदरा, रागी,सलियारा ,घांघड़ी ,चलई बाजरा भी लगता है।इन सभी अनाजों में शुगर,डायविटीज को कम करने के तत्व है और खून को शुद्वि करते है और बच्चों में अनिमियां खून की कमी को भी पूरा करते है।उन्होंने कहाकि कुल्लू जिला की लगघाटी की महिलाएं कोदरा के सिड्डू और मोमो का स्ट्राल लगाकर व्यंजन लोगों को प्रसोस रहे है।



