राज परिवार की पांच कुल देवियों ने राजा वहिंग मणिपाल की थी दैत्यों से रक्षा- महेश्वर सिंह
कहा-लंका दहन के लिए भगवान रघुनाथ की तरफ से समस्त देवी देवताओं को कुमकुम की पुड़िया भेंट कर दिया जाता है निमंत्रण

25 वर्षों के दलाश आनी के देवता जगेश्वर महादेव ने लिया भाग
न्यूज मिशन
कुल्लू
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में देव संस्कृति के अद्भुत इतिहास संजोए हुए। ऐतिहासिक ढालपुर मैदान पहुंचे देवी देवताओं का अपना प्राचीन इतिहास है ऐसे में राज परिवार की पांच कुल देवियों का भी प्राचीन इतिहास है। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में जहां देवी देवता एक दूसरे से रिश्तेदारी देवमिलन कर रहे हैं वही दूसरी तरफ भगवान रघुनाथ के मंदिर में दर्शन ओके लिए अपार भीड़ उमड़ रही है। और भगवान रघुनाथ के अस्थाई शिविर में श्रद्धालु परिवार की सुख समृद्धि के लिए आशीर्वाद दे रहे हैं वही भगवान रघुनाथ के मंदिर में माहौल भक्ति मय है। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव देव संस्कृति के सेक्शन संवर्धन प्रचार प्रसार का केंद्र है जहां पर प्राचीन देव संस्कृति और समृद्ध लोक नृत्य और देव परंपराओं का निर्वाहन किया जा रहा है।
भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ी बरदार महेश्वर सिंह ने कहा कि कार्तिक संक्रांत शुरू हुई है और ऐसे में आउटर श्रद्धा के लोगों ने संक्रांति पर डेढ़ घंटे पूजा अर्चना की है उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव देव महाकाल कुंभ का आज पांचवा दिन है और कल छठा दिन मोहल्ला उत्सव होगा और उसके बाद अंतिम लंका दहन होगी उन्होंने कहा कि कल मोहल्ले के दिन रावण वध के लिए तैयारी होगी। उन्होंने कहा कि भगवान रघुनाथ की तरफ से सभी देवी देवताओं को कुमकुम की पुड़िया लंका दहन के लिए निमंत्रण जाता है उन्होंने कहा कि मोहल्ले की रात देवी रूप की पूजा होती है जिसमें माता त्रिपुरा सुंदरी के कारकून इसमें भाग लेने और लंका दहन से पहले देवी की पूजा की जाती है। उन्होंने कहा कि राज परिवार की पांच कुल देवियां है जिनका इतिहास का बहुत महत्व है उन्होंने कहा कि माता त्रिपुर सुंदरी कातो मंत्र उच्चारण में भी पूजा अर्चना में नाम लिया जाता है उन्होंने कहा कि मैनपुरी से लेकर त्रिपुरा सुंदरी का इतिहास जुड़ा हुआ है उन्होंने कहा कि कंखन्न अब उसे मायापुरी भी बोलते हैं उन्होंने कई माता त्रिपुरा सुंदरी ने जब मायाजाल जब विष्णु भगवान का रूप लेकर बनाया था समुद्र मंथन के समय अमृत कच्छ निकाला तो फिर सब देवताओं ने स्तुति की माता त्रिपुर सुंदरी के पास ओके दैत्य अमृत न पी जाए और अमर ना हो जाए यह जिम्मा विष्णु भगवान ने माता त्रिपुर सुंदरी को दिया था। उन्होंने कहा कि माता त्रिपुर सुंदरी ने सुंदर रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाया और दैत्यों को सुर पिलाया। दूसरी कल कुलदेवी माता शबरी है जिसने हमारे बजुर्ग वहिंग मणिपाल को बचाया था उन्होंने कहा कि उसे वक्त माता त्रिपुर सुंदरी ने मकड़ी बनाकर दाल बना था और मंदिर को खंडर बात कर बचाया था। उन्होंने कहा कि तीसरी चौथी कुलदेवी माता दोता और मोचा भोटों की देवी है।जो भूटान की है जो स्पीति और किनौर भी बोलते है। उन्होंने कहा कि दोनों माता करजां में मंदिर है। उन्होंने कहा कि पांचवी कुलदेवी माता हडिंबा है जिसका इतिहास सभी जानते हैं उन्होंने कहा कि हमारे परिवार की दादी है उन्होंने कहा कि पांडव वंश में आई थी और भीम से शादी हुई थी।उसके बाद घटोत्कच पैदा हुए था। उन्होंने कहा कि जब भी राजा रण में जाते थे तो पांच वीर की दराग जाएगी।जिसमें करनाल जिसमें तलवारों के घाव लगे है। जिसको देवता नए स्वरूप में बनाने नहीं देता उन्होंने कहा कि वह निशानी है की करनाल जो है वह राजा के साथ ही चलती थी। और आज भी रघुनाथ जी के साथ यह करनाल बाजा चलता है
देवता जागेश्वर महादेव तलाश के कदर सुरेश ने कहा कि जागेश्वर महादेव डैलस से हैं और दशहरा उत्सव में 133 किलोमीटर दूर से पैदल चलकर कुल्लू पहुंचे हैं उन्होंने कहा कि देवता जागेश्वर महाराज जी का इतिहास द्रोपर युग में कोटकुहाड़ नामक स्थान से हुई है और वहां से बहते हुए क्यार रठो से किसान के द्वारा हल चलाते समय हल की नोक से मोहरा की उत्पत्ति हुई है उन्होंने कहा कि किस ने जब उसे मोहरे को अपने घर में अनाज की कोठरी में रखा तो अनाज के बीच रखने के बाद फिर से मोहरा सबसे ऊपर दिखता था उन्होंने कहा कि उसके बाद उनका आवास हुआ कि यह कोई चमत्कारी चीज है उन्होंने कहा कि उसके बाद देवता ने किस को स्वप्न में आकर जहां से चीटियों की लाइन लगेगी और जो डेरा वह बनाएगी वहां पर मेरा मंदिर स्थापित करो उसके बाद जब वहां से चीटियों की लाइन चली तो वह तलाश के पास इकट्ठा हो गई और वहां पर देखते के मंदिर की स्थापना की गई है उन्होंने कहा कि देवता के दर्शन के लिए वहां पर देवता जगेश्वर महादेव शिव का रूप है और वहां पर नंदी भगवान भी विराजमान है और परिपूर्ण है उन्होंने कहा कि बाकी जगह नंदी महाराज छोटे हैं लेकिन वहां पर परिपूर्ण है उनका की वहां पर जगह को छोटा कैलाश के नाम से भी जाना जाता है और जगेश्वर महादेव का मेला लगता है जिसको मैंने दशहरे के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने कहा कि इससे पहले देवता 1999 में दशहरा उत्सव में आए थे और अब 25 वर्षों के बाद दशहरा उत्सव में आए हैं। दशहरा उत्सव में देवता जागेश्वर महादेव घाटी के देवी देवताओं व अन्य देवी देवताओं से देव मिलन करते हैं और भगवान रघुनाथ जी के मंदिर और स्थाई शिविर में भी हाजिरी भरते हैं उन्होंने कहा कि देवता बीमारियों से श्रद्धालुओं की रक्षा करते हैं और ऐसे में करोड़ों महामारी में भी उसे क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को कोरोना नहीं हुआ है और देवता के आशीर्वाद से ही घाटी के लोगों की सुख समृद्धि और बीमारियों से मुक्ति मिलती है। उन्होंने कहा कि भगवान के मोहरे देखकर ही आभास होता है कि भगवान खुश है या नाराज है उन्होंने कहा कि जब मुखौटा चमकता है और तब लगता है कि देवता खुश है लेकिन जब वह कोटा काला पड़ जाता है तो लगता है कि देवता नाराज है उन्होंने कहा कि देवता लोगों को कई गंभीर बीमारियों से मुक्त रखना है और भूत-प्रेत शक्तियों से भी बचाव करता है।



