कुल्लूबड़ी खबरहिमाचल प्रदेश

हिमालया का दोहन जरूरत से ज्यादा करना पहाड़ों की सभ्यता संस्कृति पर खतरा -सोनम बांगचुक

कहा-लद्दाख में संविधान के 6th शेड्यूल के तहत लोकतंत्र की बहाली करें केंद्र सरकार

चीन 50,60 बर्षो से  भारत की सीमाओं पर  लदाख के चरगाहों की भूमि रहा अतिक्रमण

लद्दाख में कॉर्पोरेट घराने चारागाह भूमि पर सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट के लिए बिना पूछे कर रहे कार्य
न्यूज मिशन

कुल्लू
लद्दाख के पर्यावरण विद सोनम बैंग तुमने कुल्लू में पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि हिमालय के संरक्षण लद्दाख जनजातीय संस्कृति के संरक्षण संवर्धन के लिए पदयात्रा आंदोलन एक सितंबर से ले से शुरू हुआ है उन्होंने कहा कि लेकी अपेक्स बॉडी की तरफ से यह पदयात्रा की जा रही है और हम समर्थन में इस यात्रा में शामिल हुए हैं उन्होंने कहा कि इस पदयात्रा के माध्यम से केंद्र सरकार से मांग है कि भारतीय संविधान के शेड्यूल सिक्स के तहत जनजातीय संस्कृति जहां पर 90% से अधिक संरक्षण के तहत लद्दाख में लोकतंत्र की बहाली की जाए और केंद्र सरकार को हम यह याद दिलाना चाहते हैं कि केंद्र सरकार ने चुनाव के समय 2019 और 20 के चुनाव में जो बातें किए थे उनको याद दिलाने के लिए कि उसे वादे को पूरा किया जाए और लद्दाख के नेताओं के साथ लोकतंत्र की बहाली के लिए वार्ता की जाए उन्होंने कहा कि लद्दाख में लोकतंत्र की स्थापना की जाए। जिस प्रकार जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र की स्थापना हुई है उन्होंने कहा कि इस तरह लद्दाख में भी असेंबली बनाई जाए और लोकतंत्र में जन सहभागिता जरूरी हो उन्होंने कहा कि हिमालय जरूरत के हिसाब से किया जाए उन्होंने कहा कि हिमालय को अभी चलाया जा रहा है तो लदाख में भी या लेजिसलेच्योर की मांग कम करने जा रहे हैं तो हिमालय को एक कंजेबल जिसे हम भोग करें ऐसे एक स्रोत या साधन या खदान की तरह शोषण के लिए दोहन के लिए नहीं देखना चाहिए हिमालय हमारी एक संरक्षक है जिसने हमें दुश्मनों से बचाया है पानी दिया है साफ हवा दी है पेड़ पौधे फूल पक्षी दिए हैं तो इसे हम दूर की दृष्टि से बचाए रखें यह चाहिए कि हम आज के पीढ़ी के जरूरत से भी ज्यादा ऐश असय्याशियों के लिए इसका दोहन ना करें इसे हम एक पवित्र देव भूमि की तरह रखें जहां शिवजी का वास होता है जो की है पानी का पूरे उत्तर भारत के तो इसको हम खदान कॉर्पोरेट के हाथ में देकर इसमें से क्या कमाई क्या फायदा ले  यह ना देखें देखेंगे भी तो अभी जैसा देख रहे हैं हम की कॉरपोरेट्स जाकर अपना फायदा लेकर चले जाते हैं उसके बाद जब बाढ़ आती है भूस्खलन होता है तो स्थानीय लोगों को भुगतना पड़ता है और फिर उसकी मरम्मत कर  दाताओं के पैसे से होती है यह मॉडल बहुत ही खराब है इसको पहले से ही सोच समझ कर प्रबंधन या विकास किया जाना चाहिए। हिमालय का शोषण नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि लद्दाख में जो चरवाहे हैं  चांगपा  समुदाय हैंवो  विस्थापित हो रहे हैं वह विस्थापित दो कारणों  से हो रहे है। पिछले 50-60 सालों से चीन की तरफ से जो अतिक्रमण  हो रहा है और वह अभी तक नहीं थमी है वह दूसरी तरफ अब नया एक आयाम शुरू हुआ है कि जो बड़े कंपनी से उनको उनके चला कर दिए जा रहे हैं ताकि उसमें से सूर्य ऊर्जा से बिजली निकले क्योंकि बुरी बात नहीं है मगर उन लोगों से स्थानीय लोगों से बिना समन्वय किए   उनको ढकेल के उनको बिना बताए आप तार ले जा रहे हैं कहीं तो कहीं खोद रहे हैं यह अच्छी बात नहीं है तो छठवें शेड्यूल में स्थानीय जनजातीय से पूछे बिना विकास नहीं होती और यहां के जो स्थानीय लोग हैं वह भी चाहते हैं भारत का विकास हो मगर ऐसे तरीके से हो कि कल को लेने के देने ना पड़े तो इसलिए स्थानीय लोगों की  सहभागिता 6 शेड्यूल में आती है हम बात कर रहे हैं यह नहीं है कि वहां विकास ना हो तो वैसा ही हम चाहते हैं हिमाचल में भी जो हाइड्रो पावर हो रहे हैं जो पावर ग्रिड लाइंस की जाल बीच  रही है उसमें स्थानीय लोगों को नजर अंदाज कर दिया जाता है और पावर मुंबई दिल्ली में पहुंचता है जहां पर लोग आधा उसे करते हैं आधा मिस उसे करते हैं और बाकी बेस्ट करते हैं तो ऐसा नहीं हो जिसमें बड़े शहरों के नाम पर यह पहाड़ों में रहने वाली सभ्यताएं जो की हजारों सालों से चली आ रहे हैं वह बिखर जाएं के लिए विकसित भारत जिस रास्ते पर दुनिया चली है जो की मैटेरियल कंजप्शन पर आधारित है वह फेल हो चुका है वह हम देख रहे हैं पर्यावरण में जो अब विनाश हो रहा है उसे सब समझ गए तो भारत एक ऐसा नया रास्ता बताएं जिसमें कि इस तरह से हम व्यक्ति को लूटने ना रहे हैं हम अनियंत्रित इच्छाएं हैं उनका पूरा करने में नहीं बल्कि प्रकृति का भी इज्जत करें संतुलित आज ज्यादा तार लोग रोटी कपड़ा मकान मिल चुका है जिनका नहीं मिला है उनके लिए जरूर सब कुछ करें मगर जिनके पास रोटी है तो इन्हीं वक्त की तो रोटी खा सकते हैं तो इस तरह का विकास जिसमें सबके पास काफी हो मगर आरसी नहीं हो जैसे गांधी जी ने कहा है इस पृथ्वी पर सब की जरूरत के लिए सब कुछ है इनफ फॉर एवरीवन’एस नीड बट नॉट इनफ फॉर एवरीवन ग्रीड  यह विकास का मॉडल भारत दर्शाइए कि कहां पर ग्रेड है कहां पर  है ऐसे दुनिया जहां पर लोग अपने जरूरत को नीचे को पूरा करें मगर बीच तक न जाए आज न्यूयॉर्क और लंदन ब्रिज के रास्ते पर निकाल कर इस दुनिया का यह हालत किया है तो भारत को एक विकसित भारत जब बोलते हैं तो उनकी नकल करके उनके बराबर जीडीपी करके दिखाना कोई बड़ी बात नहीं होगी अलग रास्ता दिखाने की जरूरत है।

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