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स्वामी विवेकानद के अनुसार यदि वेदान्त को आधुनिक आवश्यकताओं एवं मूल्यों से जोड़ा जाय तो भारत की अनेक समस्याओं का समाधान संभव है – डा. श्रीप्रकाश मिश्र

स्वामी विवेकानंद के सपनो का भारत एवं वर्तमान शिक्षा व्यवस्था विषय पर सरस्वती पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल द्वारा व्याख्यान कार्यक्रम संपन्न।

न्यूज मिशन
20 दिसंबर 2024 जरी, कसोल, कुल्लू

स्वामी विवेकानन्द ऐसी शिक्षा प्रणाली को उपयुक्त मानते थे जो व्यक्ति को जीवन में आने वाले संघर्ष के लिए तैयार कर सके। उसे इस योग्य बनाये कि भविष्य की चुनौतियों का डटकर सामना कर सके। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को स्वावलंबी बनाया, उसमें आत्मविश्वास की भावना का विकास कर सके। यह विचार सरस्वती पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल जरी, कसोल, भुंतर, कुल्लू द्वारा स्वामी विवेकानंद के सपनो का भारत एवं वर्तमान शिक्षा व्यवस्था विषय पर आयोजित एक व्याख्यान कार्यक्रम में मातृभूमि सेवा मिशन धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र के संस्थापक डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किये। कार्यक्रम का शुभारम्भ विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा संगीतमय  सरस्वती वंदना से हुआ। विद्यालय परिसर पहुंचने पर कार्यक्रम के मख्य अतिथि डा. श्रीप्रकाश मिश्र का विद्यालय प्रबंध समिति द्वारा स्वागत एवं अभिनन्दन किया।
डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने सरस्वस्ती पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल के कुछ विशिष्ट मेधावी बच्चों को स्मृति चिन्ह एवं अंग वस्त्र भेंटकर सम्मानित किया। विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए डा.श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा  स्वामी विवेकानंद ने अपने व्याख्यानों एवं चिन्तन से यह सिद्ध किया कि यदि वेदान्त को आधुनिक आवश्यकताओं एवं मूल्यों से जोड़ा जाय तो भारत की अनेक समस्याओं का समाधान संभव है। स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा संबंधी सिद्धान्त में प्रमुख रूप से माना था कि विद्यार्थी को व्यवहारिक प्रशिक्षण देना चाहिए। छात्र सर्वांगीण विकास कर सके ऐसी शिक्षा होनी चाहिए। स्वामी जी का मानना था कि छात्र को कोई सिखा नहीं सकता, वह स्वयं ही सीखता है। ज्ञान तो व्यक्ति में पहले से ही है, केवल उपयुक्त वातावरण की आवश्यकता होती है। छात्रों के साथ-साथ छात्राओं की शिक्षा पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए। देश के औद्योगिक विकास के लिए तकनीकी शिक्षा अवश्य दी जानी चाहिए।

डा. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा स्वामी जी का मानना था कि यदि व्यक्ति एकाग्र होकर अध्ययन, मनन एवं चिन्तन करे तो उसे इसी अर्थ में ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। जो व्यक्ति किसी भी विषय में या ज्ञान विज्ञान की किसी भी धारा में यदि अधिकारपूर्ण एवं पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहता है तो उसे एकाग्रता को अपनाना होगा। विद्यार्थी को ऐसा वातावरण देना चाहिए कि वह स्वयं सीख सके क्योंकि सीखता तो वह स्वयं ही है, कोई उसे ज्ञान आवश्यक रूप से सिखा नहीं सकता।
स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों में अन्तःकरण का विकास ,आध्यात्मिकता का विकास , नैतिकता का विकास,शारीरिक विकास एवं शुद्धता तथा ज्ञानेन्द्रियों के प्रशिक्षण को माना था तथा शिक्षण पद्धति में मातृभाषा, शिक्षण में एकाग्रता, प्रेम और सहानुभूति, छात्रों के मनोभावों एवं रुचियों तथा स्वानुभव द्वारा सीखने पर बल दिया। स्वामी जी शिक्षा में शिक्षक की भूमिका को अति महत्वपूर्ण मानते थे। विद्यार्थियों को भी प्राचीन सनातन संस्कृति के अनुसार शिक्षकों का उच्चतर दर्जा और उनके प्रति आदर एवं सम्मान के भाव को पुनर्जीवित करना होगा तभी राष्ट्र विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा सकेगा तथा भारत पुनः विश्व गुरु के पद पर प्रतिष्ठित हो सकेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सरस्वती पब्लिक सीनियर सेकेंडरी स्कूल के चेयरमैन, समाजसेवी एवं शिक्षाविद सुशील कुमार ने कहा भारतीय ज्ञान परम्परा और सनातन संस्कृति की शिक्षा ही ही आज के विद्यार्थियों का समग्र विकास होगा। कार्यक्रम के अति विशिष्ट अतिथि शिक्षाविद एवं मोटिवेशनल स्पीकर कपिल मदान ने विद्यार्थियों को स्वावलंबी व आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया।आभार ज्ञापन विद्यालय की प्रधानाचार्या श्रीमती चंपा देवी ने किया। कार्यक्रम का संचालन उप प्रधानाचार्य हेमचंद ने किया। कार्यक्रम में शिक्षक अमन, शिक्षक अमरनाथ, शिक्षक विनोद ठाकुर, प्रियांशु ठाकुर  सहित विद्यालय के समस्त शिक्षक, विद्यार्थी एवं अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे।
राजेंद्र ठाकुर

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