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स्थानीय बोलियों से जुड़े रहना आवश्यक : डाॅ. वरयाम सिंह,

कुल्लू साहित्य उत्सव में भाषा, सिनेमा और आदिवासी परम्परा पर विद्वानों ने रखे महत्त्वपूर्ण वक्तव्य ।

न्यूज मिशन

कुल्लू, 29 फरवरी 2024।

हिम तरु प्रकाशन समिति व भाषा विभाग के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित तीन दिवसीय कुल्लू साहित्य सम्मेलन का दूसरा दिन स्थानीय बोलियो व व्याकरण के महत्व व सामाज में ब्याप्त कुरीतियों व रूढ़िवादी धारणाओ पर वृत्त चित्र के माध्यम से गहरी चोट , सिनेमा व साहित्य के अंतर्द्वंद्व व आदिवासी परम्परा साहित्य व इतिहास,पर गहरी परिचर्चा के नाम रहा।।
स्थानीय बोलियों में व्याकरण की सापेक्षता है तथा हमें तुकबंदी से मुक्त होना आवश्यक है। यह बात कुल्लू साहित्य उत्सव के दौरान जेएनयू के सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं भाषाविद डाॅ. वरयाम सिंह ने कही।
उन्होंने भाषा एवं स्थानीय बोलियों के अंतर्सबंद्ध पर अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि भाषा एवं वाणी भिन्न हैं तथा भाषा अंदर से है जबकि वाणी बाहर से, अंततः एक-दूसरे में समाहित होकर बातचीत का माध्य बन जाती हैं। इसलिए हम जिस परिवेश एवं क्षेत्र विशेष में रहते-पलते हैं, वहां की स्थानीय भाषा एवं बोलियों को स्वतः ही सीख लेते हैं।
प्राची द्वारा कुल्लू जिला के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान घर के बाहर रहने की असामाजिक परम्परा तथा उन्हें होने वाली मानसिक पीढ़ा से सम्बद्ध लघु डाॅकुमेंटरी प्रस्तुत की। इस लघु वृतचित्र के माध्यम से पूर्वा-प्राची ने समाज के लिए महत्वपूर्ण संदेश प्रेषित किया है।

दिल्ली से सम्बद्ध फिल्मकार एवं लेखक संजय जोशी ने “साहित्य और सिनेमा के अंतर्संबंध” विषय पर अपना वक्तव्य दिया तथा इन्होंने लघु फिल्मों के माध्यम से सिनेमा तथा साहित्य के गूढ़ संबंध की व्याख्या की। जोशी ने प्रिंटेड रेनवो, भुवन शोम तथा अन्य लघु फिल्मों के जरिए इस बात पर बल दिया कि एक बेहतर सिनेमा के लिए बेहतर साहित्य का होना आवश्यक है।
झारखंड के युवा एवं चर्चित कवि अनुज लुगुन ने “आदिवासी परम्परा: इतिहास एवं साहित्य” विषय पर वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि आदिवासी साहित्य उनकी परम्परा में समाहित है तथा वहां के दैनिक बोलचाल के वाक्य, लोक गाथाएं, लोक कथाएं तथा लोकगीत में स्पष्ट होती हैं तथा निश्चित तौर पर यह आदिवासी परम्परा को संजोए रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी गौरव की लोकगाथा समृद्ध है तथा इसे सहजेगा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आदिवासी साहित्य को तब तक नहीं समझा जा सकता है, जब तक कि परम्पराओं के बुनियादी संबंधों को समझ नहीं पाओगे।
दूसरे दिन के कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्ठ लेखक डाॅ. सुशील कुमार फुल्ल थे जबकि जिला भाषा अधिकारी, कुल्लू सुनीला ठाकुर बतौर विशेष अतिथि उत्सव में सम्मिलित हुई।
इस दौरान हिमतरु के सचिव एवं साहित्य उत्सव के समन्वयक किशन श्रीमान, साहित्य उत्सव कोर समिति सदस्यों में; डाॅ. निरंजन देव शर्मा, अजेय, डाॅ. उरसेम लता, रमेश पठानिया, डाॅ. संजू पाॅल, हिमतरु प्रकाशन समिति के सलाहकार युवराज बोध,अध्यक्ष गणेश गनी, संस्थापक सदस्य कृष्णा ठाकुर सहित तमाम पदाधिकारी एवं उत्सव समिति के सदस्य तथा अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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