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पर्यावरण बदलाब से पानी की थिकनेस और गुणवत्ता पर पड़ रहा असर-प्रोफेसर एस श्रीकेश
कहा- 50 वर्षों के बाद गुणवत्ता पर पड़ेगा ज्यादा असर करनी चाहिए चिंता

न्यूज मिशन
कुल्लूकुल्लू जिला के गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान मौहल में जियोग्राफी एंड क्लाइमेट चेंज इश्यूज एंड चैलेंजिंग पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार संपन हुआ। सेमिनाार में देशभर के कई राज्यों के शोधार्थियों ने शोध पत्र पढे इस राष्ट्रीय स्तरीय सेमिनार में दिल्ली जेएनयू के प्रोफेसर एस श्रीेकेश ने पिछले 30 सालों के अध्यन की विशेष रिपोर्ट रखी जेएनयू के प्रोफेसर एस श्रीकेश ने मीडिया के सवालों के जवाब में कहा कि कोविड में इकोनॉमिक एक्टिविटी कम होने के चलते एरोसॉल का ऑप्टिकल कंसोलेशन कम था उन्होंने कहा कि भारतवर्ष के जिस जिस क्षेत्र में लॉकडाउन रहा वहां पर 6 से 1 साल तक एरोसॉल ऑप्टिकल कंसोलेशन 413 से 408 पीपीएम एवरेज में आया था। उन्होंने कहा कि एनर्जी प्रोड्यूस के लिए थर्मोप्लान्ट चलने से उस एरिये में एमिशन ऑप्टिकल कंसोलेशन देखने को मिला रहा है। अरे कहां की हुमन एक्टिविटीज के कारण इंटरसिटी ऑफ एक्टिविटी के चलते एमिशन ज्यादा हो रहा है और रेडिएशन को कैप्चर करने वार्मिंग प्रोसेस हो रहा है उन्होंने कहा कि सोलर एक्टिविटी पिछले 20 वर्ष के डाटा देखने पर कूलिंग नजर आ रहा है लेकिन टेंपरेचर में बढ़ोतरी आ रहा है। उन्होंने कहा कि ग्लेशियर के मेल्टिंग होने से नदियों में पानी अधिक मात्रा में मिल रहा है। गर्मियों में तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पिघल रहे हैं जिससे पानी की काफी मात्रा उपलब्ध हो रही है लेकिन पानी की थिकनेस में बदलाव हो रहा है धीरे-धीरे थिकनेस घट रही है जिसमें मिनरल्स खत्म हो रही है। उन्होंने कहा कि आने वाले 50 वर्षों में पानी की गुणवत्ता खराब हो जाएगी जिसकी चिंता करनी चाहिए।



